Thursday, September 5, 2019

फेसबुक पर 4 सितंबर 2019 का पोस्ट

ओपन माइक पर पिछले बुधवार को हुए पक्ष और विपक्ष के बहस की प्रतिक्रिया के रूप में आज के हिन्दुस्तान में मेरी बेबाक राय..

☝️ सर्वप्रथम यह समझना होगा कि ओपन माइक और साहित्य दो अलग-अलग चीज है परंतु लोग इसको समझ नहीं रहे। ओपन माइक एक व्यवसायिक व्यवस्था है जिसे कुछ रेस्तरां या अन्य व्यवसायिक केन्द्र तथा इंटरनेट पर आपके विचारों को उक्ति (quotes) के रूप में प्रदर्शित करके रातों-रात बड़े कवि या दार्शनिक बनने के झूठे सपनों को बेचने का काम करने वाली कंपनियां हैं।
क्या ये साहित्य है? कोई भी साहित्य अपनी खास विधा तथा अनुशासन से बनता है और ओपन माइक में कोई अनुशासन नहीं। कुछ नवोदित और ओपन माइक के हिमायती कह रहे हैं कि कवि सम्मेलन की अंदरूनी राजनीति पर यह चोट है तथा मठाधीशों को जवाब। मैं कहना चाहता हूं कि कोई भी प्रतिभा कभी भी किसी की मोहताज नहीं रही और खासकर साहित्य तो कभी भी नहीं क्योंकि सार्थक साहित्य में अभी भी बहुत जगह है कुछ करने के लिए। आज के बदलते युग और ग्लोबल जमाने में यह कहना हास्यास्पद है कि किसी को मंच नहीं मिल रहा। आज बहुत सारे मंच हैं जहां नवोदित रचनाकारों को दिल खोलकर मौका दिया जा रहा है। अकेले पटना में बहुत सारे मंच हैं जो मौका दे रहे हैं बस शर्त यह कि रचना अपनी हो और साहित्यिक हो। वरिष्ठ साहित्यकार नवांकुरों को लाइट हाउस की तरह रास्ता दिखाने का कार्य करते हैं जो आवश्यक भी है।

वास्तव में ओपन माइक पर साहित्य छोड़कर सब कुछ हो रहा है जैसे इश्क़ मुहब्बत और इश्क में नाकाम शायरी की बातें, चुटकुले, एक्टिंग, स्टोरी टेलिंग, गीत गाना, रैप आदि। कोई बताए रैप कौन सा साहित्य है? और हां मज़ेदार बात तो यह है कि ऐसे ओपन माइक्स में शामिल होने के लिए पैसे भी देने पड़ते हैं जो कि पुरी तरह मामले को व्यवसायिक बनाता है। अपने पैसे से अपना माला खरीदकर अपने आप को पहनाना कौन सा साहित्य है?

☝️परंतु हां, ओपन माइक कला के लिए एक नई व्यवस्था हो सकती है परन्तु तब भी मार्गदर्शन के लिए गुणी लोगों की आवश्यकता होगी।

साहित्य में योगदान और आनेवाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर संदेश आप सिर्फ गंभीर लेखन, उत्कृष्ट रुचि और जज़्बा से दे सकते हैं। शालीनता एवं सहनशीलता बहुत आवश्यक है एक साहित्यकार के लिए। क्योंकि हम साहित्य लिखते नहीं बल्कि रचते और गढ़ते हैं, आनेवाली पीढ़ियों के लिए।

☝️इसलिए मंच कोई भी हो परंतु गुणी साहित्यकारों की देखरेख में सिखना, गुण दोष जान समझ आगे बढ़ना और तब मेहनत से प्रसिद्धि हासिल करना हीं श्रेयस्कर होगा।

परंतु आज बाजारवाद सभी क्षेत्रों पर हावी है इसलिए यह तुरत फुरत वाली प्रसिद्धि आने वाले दिनों में बहुत आगे जाने वाली है इसमें कोई संदेह नहीं परंतु साहित्य का कितना नफा और नुक्सान होने वाला है यह तो वक्त हीं बताएगा।

🙏

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